रायपुर (शेखर झा). बास्केटबॉल की इंटरनेशनल खिलाड़ी राधा राव कालवा 6 साल से छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में आदिवासी खिलाड़ियों को फ्री में ट्रेनिंग दे रही हैं। यहां के दो खिलाड़ियों ने इंटरनेशनल में जबकि 20 से अधिक खिलाड़ियों ने नेशनल में मेडल जीते हैं। नेशनल में 15 मेडल जीतने वाली राधा को उनके खेल के आधार पर नौकरी मिली। आदिवासी खिलाड़ियों का स्टेमिना और फुर्ती देखकर उन्होंने ट्रेनिंग देने की सोची। फैमिली सपोर्ट भी मिला। नौकरी छोड़ी और अब तक 75 से अधिक खिलाड़ियों को ट्रेनिंग दे चुकी हैं। खिलाड़ियों को निजी कंपनी की ओर से फ्री में खेल सामग्री मिलती है। ये खिलाड़ी दो निजी स्कूलों में पढ़ाई करते हैं और हॉस्टल में रहते हैं। स्कूल भी फीस नहीं लेते।
दंतेवाड़ा की गीता ने वर्ल्ड स्कूल चैंपियनशिप में सिल्वर जीता
दंतेवाड़ा की गीता यादव वर्ल्ड स्कूल चैंपियनशिप में सिल्वर जीत चुकी हैं। राधा से ट्रेनिंग ले चुके कई खिलाड़ी स्कूल नेशनल और ओपन नेशनल में भी मेडल जीत चुके हैं।
1. गीता यादव (दंतेवाड़ा): पेरिस में हुए वर्ल्ड स्कूल 3x3 चैंपियनशिप में सिल्वर। नेशनल में भी 10 मेडल।
2. रबिना पैकरा (अंबिकापुर): एशियन पैसेफिक यूथ गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल। नेशनल में 10 मेडल।
3. सुलोचना तिग्गा (मैनपाट): वर्ल्ड स्कूल चैंपियनशिप में हिस्सा ले चुकी हैं। नेशनल में 8 मेडल।
4. निशा कश्यप (अंबिकापुर): एशियन स्कूल और दो वर्ल्ड चैंपियनशिप में उतरीं। नेशनल में 14 मेडल।
5. शांति खाखा (पत्थलगांव): नेशनल चैंपियनशिप में 3 बार गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं।
2013 में शुरू की आदिवासियों की ट्रेनिंग
राधा खुद खिलाड़ी रहीं हैं। वे नेशनल में छत्तीसगढ़ के अलावा पंजाब से भी खेल चुकी हैं। 20 नेशनल और इंटरनेशनल में उतरीं। अच्छे प्रदर्शन के कारण पश्चिम रेलवे में नौकरी मिली। पति राजेश्वर राव राजनांदगांव स्थित साई सेंटर के इंचार्ज हैं। इसके बाद राधा नौकरी छोड़कर राजनांदगांव आ गईं। इस दौरान वे साई सेंटर भी जातीं। यहां उन्होंने आदिवासी खिलाड़ियों को देखा। वे उनकी मेहनत को देखकर काफी प्रभावित हुईं और उन्हें ट्रेनिंग देने का फैसला किया। पति ने भी उनका सपोर्ट किया। 2013 से ट्रेनिंग की शुरुआत हुई। वे दंतेवाड़ा, पत्थलगांव जैसे सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के खिलाड़ियों को भी ट्रेनिंग दे चुकी हैं।
राधा हर साल स्टेट और नेशनल से खिलाड़ियों का सिलेक्शन करती हैं
32 साल की राधा बताती हैं, “हर सीजन के लिए बच्चों की तलाश जनवरी से शुरू होती है और अप्रैल तक चलती है। इस दौरान बस्तर और सरगुजा समेत आदिवासी क्षेत्रों में होने वाले स्टेट व नेशनल लेवल टूर्नामेंट में जो टीमें हिस्सा लेती हैं, उनके बच्चों के प्रदर्शन को देखती हूं। इनमें से 30 से 40 बच्चों का सिलेक्शन करती हूं। इन बच्चों को एक महीने कैंप में रखकर ट्रेनिंग देती हूंं। प्रदर्शन के आधार पर 15 से 20 बच्चों की फाइनल लिस्ट जारी की जाती है। एक साल में जिन बच्चों को प्रदर्शन अच्छा रहता है, उनकी ट्रेनिंग जारी रहती है। अन्य बाहर हो जाते हैं।”
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